लोकतंत्र, पत्रकारिता और सामाजिक विषमता पर गोपाल प्रसाद ‘आरटीआई सेवक’ का बयान

लोकतंत्र, पत्रकारिता और सामाजिक विषमता पर गोपाल प्रसाद ‘आरटीआई सेवक’ का बयान “लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, जवाबदेही और नागरिक गरिमा सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था का नाम है।” लोकतंत्र की परिभाषा हमने पढ़ी थी—“जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन।” लेकिन आज भी मेरा सीधा सवाल है कि वह लोकतंत्र मुझे व्यवहार में दिखाई क्यों नहीं देता? यदि जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक मालिक है, तो फिर निर्णय-प्रक्रिया, राजनीतिक दलों, संस्थाओं और सत्ता के केंद्रों में आम नागरिक की भागीदारी और जवाबदेही इतनी सीमित क्यों है? आज ऐसा प्रतीत होता है कि प्रमुख राजनीतिक दलों ने ऑक्टोपस की तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनी राजनीतिक पकड़ में जकड़ रखा है और लोकतंत्र स्वयं कराह रहा है। लोकतंत्र के जिन प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—से संविधान, नागरिक अधिकारों और शासन की निगरानी की अपेक्षा की जाती है, उनकी स्वतंत्रता, जवाबदेही और संस्थागत मजबूती पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। मेरा मानना है कि किसी भी संस्था को सत्ता, दल या व्यक्ति से ऊपर संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब लोकतांत्रिक शासन में भी जातिगत भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार अथवा कथित ‘शुद्धिकरण’ जैसी घटनाएं सामने आती हैं। ऐसी घटनाएं केवल किसी व्यक्ति का अपमान नहीं हैं; वे हमारे सामाजिक विवेक और संवैधानिक चेतना के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। संविधान ने समानता और गरिमा का अधिकार दिया है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में यदि किसी की जाति के कारण उसके साथ भेदभाव होता है तो यह इस बात का प्रमाण है कि कानूनी स्वतंत्रता के बावजूद हमारी मानसिक गुलामी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हाल में राज्यसभा में विपक्ष के नेता एवं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा उत्तराखंड में उनके कार्यक्रम के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ की घटना का मुद्दा संसद में उठाया जाना इसी व्यापक सामाजिक प्रश्न को सामने लाता है। ऐसे मामलों में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तथ्यात्मक जांच, जिम्मेदारी तय करना और संविधानसम्मत कार्रवाई आवश्यक है। आरक्षण के विरोध में आवाज उठाने वालों से मेरा स्पष्ट सवाल है—यदि वास्तव में समानता स्थापित करनी है तो पहले जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था और भेदभाव समाप्त करने की ईमानदार पहल क्यों नहीं की जाती? मैं आरक्षण-विरोधियों को चुनौती देता हूं कि वे जातिप्रथा समाप्त करने, जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सामाजिक अभियान चलाने और अंतरजातीय विवाह को सामाजिक स्वीकृति देने की दिशा में आगे आएं। यदि समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो जाती है और सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमता समाप्त हो जाती है, तो आरक्षण की आवश्यकता पर नए सिरे से विचार करना स्वाभाविक होगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक लोकतंत्र को केवल राजनीतिक अधिकारों से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व से जोड़ा था। इसलिए लोकतंत्र की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि चुनाव हो रहे हैं; असली प्रश्न यह है कि क्या समाज के अंतिम व्यक्ति को समान सम्मान, अवसर, न्याय और सुरक्षा मिल रही है? “गुलामों को उसकी गुलामी का अहसास करा दो, क्रांति स्वतः हो जाएगी”—यह विचार आज भी सामाजिक चेतना के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। लेकिन आज की लोकतांत्रिक क्रांति हिंसा या अराजकता की नहीं, बल्कि संवैधानिक जागरूकता, प्रश्न पूछने, सूचना मांगने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक भागीदारी की क्रांति होनी चाहिए। पत्रकारिता की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसलिए पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और जनता को तथ्य उपलब्ध कराना होना चाहिए। मीडिया को यह याद रखना चाहिए कि न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार "प्रत्येक क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।" यदि पत्रकारिता लगातार सत्ता के पक्ष में एकतरफा दिखाई देगी और जनता के वास्तविक सवालों को नजरअंदाज करेगी, तो जनता का विश्वास उससे दूर होना स्वाभाविक है। जिस मीडिया संस्थान को जनता “गोदी मीडिया” के रूप में देखना शुरू कर दे, उसके सामने सबसे बड़ा संकट उसकी विश्वसनीयता का होता है। सत्ता के साथ निकटता पत्रकारिता की स्वतंत्रता का विकल्प नहीं हो सकती। मेरा किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान को अपमानित करने का उद्देश्य नहीं है; मेरा आग्रह केवल इतना है कि पत्रकारिता सत्ता की प्रवक्ता नहीं, जनता की प्रहरी बने। सूचना क्रांति ने पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बदल दिया है। आज नागरिकों के पास सोशल मीडिया, स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म, नागरिक पत्रकारिता और प्रत्यक्ष सूचना के अनेक माध्यम हैं। यदि पारंपरिक मीडिया जनता के प्रश्नों को पर्याप्त स्थान नहीं देगा, तो नागरिक स्वयं अपनी आवाज के लिए वैकल्पिक मंच बनाएंगे। पारंपरिक अखबारों और टेलीविजन चैनलों की पाठक/दर्शक संख्या, प्रसार, डिजिटल पहुंच और TRP से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करते समय हमें आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों पर निर्भर रहना चाहिए। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जनता का विश्वास किसी भी मीडिया संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी है; विश्वसनीयता खोने के बाद उसे केवल विज्ञापन और तकनीकी पहुंच से वापस हासिल नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ आखिर क्या है? मेरे लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच वर्ष में एक बार मतदान करना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार; सूचना पाने का अधिकार; असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता; जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर भेदभाव से मुक्ति; स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संस्थाएं; स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता; कानून के सामने समानता; तथा सरकार और राजनीतिक दलों की निरंतर सार्वजनिक जवाबदेही। जनता मतदाता ही नहीं, लोकतंत्र की वास्तविक मालिक है। इसलिए राजनीतिक दलों, सरकारों, संवैधानिक संस्थाओं और मीडिया—सभी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र किसी एक दल, नेता या संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों की सामूहिक संवैधानिक विरासत है। मेरा संघर्ष किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि असमानता, अपारदर्शिता, राजनीतिक अहंकार, संस्थागत जवाबदेही की कमी और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सत्ता से लेकर समाज तक हर स्तर पर यह स्वीकार किया जाए कि प्रश्न पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र का दुश्मन नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी है। — गोपाल प्रसाद आरटीआई सेवक, दिल्ली मोबाइल: 9910341785, 08178949704 ईमेल: sampoornkranti2025@gmail.com #लोकतंत्र #पत्रकारिता #सामाजिक_विषमता #भेदभाव #छुआछूत #शुद्धिकरण #भाजपा #मोदी #दलित #आरक्षण #जाति # व्यवस्था_परिवर्तन #गोपाल प्रसाद #आरटीआई #आरटीआई सेवक #गोपाल_प्रसाद_आरटीआई_सेवक #गोपाल_प्रसाद_आरटीआई_एक्टिविस्ट #संपूर्ण _क्रांति #असमानता #क्रांति #प्रदर्शन

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