जब सत्ता की कुर्सी पर 'सौदागर' बैठेंगे, तो 'खेत' की बात कौन करेगा?
समाज का एक कड़वा नियम है— "व्यापारी और भिखारी को जगह से प्यार नहीं होता, उन्हें सिर्फ़ अपने 'मुनाफे' और 'भीख' से मतलब होता है।"
एक जगह धंधा पिट गया? व्यापारी दुकान बदल लेगा।
एक जगह भीख नहीं मिली? भिखारी चौराहा बदल लेगा।
लेकिन किसान? किसान अपनी 'माँ' (ज़मीन) को छोड़कर कहाँ जाएगा?
आज देश में जो किसानों के संघर्ष और आंदोलन हो रहे हैं, उनकी असली वजह नीतियों में नहीं, नीयतों में है।
सत्ता का चरित्र-चित्रण:
आज सत्ता के गलियारों में या तो वो लोग हैं जो राजनीति को 'व्यापार' समझते हैं (मुनाफा पहले), या वो जो सत्ता की 'भीख' पर पल रहे हैं। जब राजा ही 'व्यापारी' हो, तो वह खेत की हरियाली नहीं, ज़मीन की 'Market Value' देखेगा। उसे फसल के दाम से नहीं, ज़मीन के अधिग्रहण (Acquisition) से प्यार होगा।
इसीलिये उन्हें किसान की चीख सुनाई नहीं देती, क्योंकि AC कमरों में मिट्टी की सौंधी खुशबू नहीं, नोटों की सरसराहट आती है।
चौधरी चरण सिंह: एक उम्मीद जो मिसाल बन गई
याद कीजिए चौधरी चरण सिंह जी को। जब एक 'किसान पुत्र' प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा, तो संसद में पहली बार 'सेंसेक्स' की नहीं, 'गाँव, गरीब और खेत' की बात हुई।
क्यों?
क्योंकि वो जानते थे कि अगर खेत वीरान हुए, तो मंडियां अपने आप शमशान बन जाएंगी। वो ज़मीन से जुड़े थे, इसलिए ज़मीन की पीड़ा समझते थे।
आज विडंबना देखिए—
जिसका जड़ें ज़मीन से जुड़ा ही नहीं, वो हमें बता रहा है कि खेती कैसे करनी है!
जिन्होंने कभी पसीना नहीं बहाया, वो बता रहे हैं कि फसल का दाम क्या होना चाहिए।
निष्कर्ष:
जो ज़मीन से जुड़ा है, वही ज़मीन की बात करेगा। हवा में उड़ने वाले (पैराशूट नेता और कॉर्पोरेट प्रेमी) तो बस ज़मीन हड़पने की फिराक में रहेंगे।
आज लड़ाई सिर्फ़ उपज की नहीं, अपनी 'जड़ों' को इन 'सौदागरों' से बचाने की है।
चौधरी साहब की विरासत को याद रखें, किसान के साथ खड़े रहें।
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