आत्मवत व्यवहार करनेवाले राम रघुनाथ को जो स्वीकार्यता मिली है, वह प्रेम के बल पर मिली है। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है*: *गोपाल प्रसाद खटीक*

*अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में रामजी के साथ निषादराज, केवट, शबरी, विभीषण और जामवंत, सुग्रीव आदि चरित्र प्रमाणित कर रहे हैं कि आत्मवत व्यवहार करनेवाले राम रघुनाथ को जो स्वीकार्यता मिली है, वह प्रेम के बल पर मिली है। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है*: *गोपाल प्रसाद खटीक* देश में राष्ट्रचेतना जगानेवाले भ्रमणशील समालोचक, चिंतक, स्वतंत्र पत्रकार, समीक्षक, आरटीआई सेवक गोपाल प्रसाद के साक्षात्कार का महत्त्वपूर्ण अंश*___ *प्रश्न: वर्तमान स्थिति परिस्थिति में भारतीय समाज एवं भारतीय संस्कृति की दशा एवं दिशा के संदर्भ में आपका विचार क्या है?* उत्तर: प्रत्येक वर्तमान सुधार का युग होता है। इस अवधारणा के साथ संपूर्ण धरती पर जिम्मेदार ईकाई समझदार मानव को ईश्वर द्वारा स्थापित व्यवस्था में नासमझ मानव द्वारा जो क्रियाकलाप होते हैं, जिनसे व्यवस्था बाधित होती है।इसके लिए ईश्वर प्रेमी ईश्वर आराधक उपासक विवेकवान मानव को ही अपनी निजी जिम्मेदारी समझते हुए जो नासमझ हैं,उनकी समझ को विकसित कर जीवन की ओर समाज की मुख्य धारा में जोड़ने का कार्य निरंतर अबाध गति से चलते रहना चाहिए क्योंकि प्रत्येक नूतन जीवन जिसे हम अबोध शिशु के रूप में देखते हैं, उसे दिशा संपन्न बनाने की जिम्मेदारी माता-पिता एवं गुरुजनों को ही उठानी पड़ती है।* *इसलिए कहते हैं कि*_ "*मात-पिता और गुरु की वाणी*, *बिनहि विचार करिय शुभ जानी।*" *रामहि केवल प्रेम प्यारा,* *जानि लोऊ जो जाननि हारा।* *आज इस पूरी मानव सभ्यता में जो दृश्य उपस्थित हुआ है और जो स्थिति निर्मित हुई है उसके लिए जिम्मेदार है वरिष्ठ पीढ़ी, क्योंकि वह अपने मानवीय ज्ञान एवं संवेदनाओं को आचरण से प्रमाणित करने में शिथिल और असफल सिद्ध हो रही है। इस कारण से प्रबुद्ध संत चेतना द्वारा पुनः मानवीय संवेदना को आत्मवत व्यवहृत करने के उद्देश्य से जीवन की व्यवहारिक रीति-नीति को सम्यक बनाने की आवश्यकता है। इसीलिए पूज्य संतों, प्रबुद्ध अभिभावकों को निष्पक्ष मानवीय मूल्यों को आचरण से प्रमाणित कर अपनी नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। जिससे ईश्वर की यह विश्व वाटिका जो अयोग्य और अज्ञानी मानव द्वारा उजड़ती जा रही है।* *इसे पुनः सजाने संवारने का उत्तरदायित्व निभाने के लिए आवाहन करते हैं कि आओ मिलकर इस विश्व वाटिका की मनोरमता और संगीतमयता को संभाले, इसके लिए यह त्रिवेणी संगम आवश्यक है। सती नारियां, संत, शूरवीर जो मिलकर शुभ और अशुभ को निर्धारित कर दंड और पुरस्कार की व्यवस्था स्थापित कर सके।* *इस विचार स्वायत्त निर्णयशक्ति के ऊपर किसी का नियंत्रण विरोध अवरोध नहीं होना चाहिए। यदि होता है तो विचार स्वायत्तता से न्यायबोधि यह त्रिज्या सती, संत और शूरवीरों की यही सीताराम, लक्ष्मण और उनके अनन्य सहयोगी हनुमान हमें खोजना है, क्योंकि सीताराम को और उनके इस जगत को ठीक से संचालित रखने की जिम्मेदारी बुद्धिमान अग्रगण्य चारों युग प्रताप संपन्न महावीर हनुमानजी के उपासकों को निभाना है क्योंकि रामकाज के लिए ही यह चित्रयुगी वीटो पावर न्यायबोधि योद्धा हनुमान जी ही निर्णय लेने में समर्थ हैं। वे स्वयं तय करेंगे कि दण्ड किसे देना है और पुरस्कार किसे देना है?* *जो अधूरा रामकार्य है उसे पूरा करने के लिए महावीर वीरांगना के रूप में अपनी भूमिका वर्तमान युवक युवतियों को ही निभानी पड़ेगी। इसके लिए असुरत्व का शिथिलीकरण, देवत्व का पुष्टीकरण लक्ष्य कर इस संसाररूपी महानाट्यशाला रूपी रंगमंच को निरंतर संचालित रखने के लिए सबको अपने अपने अभिनय प्रस्तुत करने के लिए सम्यक ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।* "*श्रद्धावान लभते ज्ञानम, सहयो विद्वान य क्रियावान परोपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहि ते नर घनेरे।"* *तो आचरण की संस्कृति ही पीढ़ियों के लिए प्रेरक सिद्ध होती है, भाषण की नहीं। अतः गंभीरतापूर्वक सूचनात्मक ज्ञान को आचरण से प्रमाणित कर अपने धर्म कर्तव्य का निर्वहन करें।* "*कृतेच प्रतिकर्तव्यम ऐशधर्म सनातनः* *प्रश्न: मानव का स्वार्थ और अहंकारजन्य समस्याएं क्या है और उसका समाधान क्या है?* *उत्तर: अन्याय, शोषण,कदाचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भुखमरी, लाचारी, बेबसी, अशिक्षा, कुपोषण, जनसंख्या वृद्धि, प्रदूषण (वातावरण एवं मानसिक), कालाधन, अराजकता, पर्यावरण असंतुलन, पेस्टीसाइड, रासायनिक उर्वरकों का बेतहाशा इस्तेमाल, पोर्न, अश्लीलता, कामुकता को बढ़ावा देनेवाले माध्यम हमारी धर्म संस्कृति विरासतको खत्म करने की साजिश, अंग्रेज और अंग्रेजियत, मैकाले की शिक्षा पद्धति को हटाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।* *इसके लिए मातृ देवो भव,पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव।* *श्री सीतारामजी की आदर्श मर्यादा माता-पिता को अनुग्रहित करना श्री लक्ष्मण जी के आचार्यत्व को जो श्री सीताराम जी के निजी सचिव हैं और अतिथि हनुमान जी परिवाचक के तौर पर संपूर्ण प्रवृतिधर्मी समाज पर निगरानी रखकर हमारी मर्यादाओं की रक्षा करते हैं। जो उचित सीमा में रहता है, वह सानंद जीवन यात्रा करता है। जो अनुचित करता है, उसे प्रशासक हनुमानजी दंड विधान करते हैं। साधु संत की रक्षा करके असुरों को, गुंडो को मार करके सीताराम जी की मर्यादित व्यवस्था को संचालित रखते हैं।* *प्रश्न:वर्तमान शासन व्यवस्था एवं वर्तमान शासक रामराज्य प्रशासन को आत्मसात करने अथवा क्रियान्वित करने को आतुर क्यों नहीं है?* *उत्तर: हिरण्याक्ष, हिरणकश्यप, रावण, कुंभकरण, कंस, शिशुपाल जैसे अनेक शासक हुए हैं। अहंकार के कारण स्वार्थमय जीवन द्वारा जनकष्ट निवारण में सफल नहीं हो सके, इसलिए इतिहास के काले पन्नों में इनका अभ्यास अपयश अपकीर्ति दर्ज है। इनके विरुद्ध जो शासक निरभिमानी निःस्वार्थ हुए हैं, उनकी कीर्तिपताका भी इतिहास के पन्नों में वर्तमान के लिए प्रासंगिक है।* *प्रश्न: भाजपा एवं आरएसएस द्वारा हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना पर आपके विचार क्या हैं?* *उत्तर: मानवीय आदर्श क्रमशः मन, वचन, कर्म के स्तर पर एकत्व के साथ अभिनेता लेकर के संपादित होता है,तभी कीर्तिमान स्थापित होता है। इसके विपरीत मन, वचन, कर्म में जब भिन्नता रहती है तो व्यक्ति, संगठन के व्यवहार की छीछालेदार होती है और वर्तमान में यही हो रहा है। हिंदू का मतलब जो संपूर्ण जगन्नाथ का जगत है, उसमें हिंसा और शोषण को खत्म करे, वही हिंदू है,जिसे राम कहते हैं।* *प्रश्न: जब राम और रावण जब कौरव और पांडव भी हिंदू ही थे, तो फिर हिंदू राष्ट्र क्यों?* *उत्तर: अभी तक की मानव सभ्यता में युद्ध की जो विभीषिकाएं उपस्थित हुई है, उसमें रावण, कंस, कौरव इत्यादि के आचरण स्वार्थ और अभिमान के कारण पर धन और पर नारी पर अतिक्रमण करने के कारण ही हुई है। जिन्होंने हिंसा, शोषण, द्रोह, विद्रोह को रोकने का सफल प्रयास किया,उनमें स्वधन, स्वनारी को लेकर औसत जीवन को ध्यान में रखकर मर्यादापूर्वक जीवनयात्रा संपादित की। परस्पर सहानुभूति और पूरकता के साथ सुनिश्चित मात्रा में प्राप्त सार्वजनिक संपदा का सदुपयोग विवेकपूर्वक आत्मीयता के साथ परिवारमूलक भावना से किया वही कृष्ण, राम दूजे भी समाधानित प्रेरक चरित्र वर्तमान में हम सबके लिए स्वीकार करने योग्य है।* *राष्ट्रवाद की परिभाषा को विकृत कर दिया गया है। जिसे "वयम राष्ट्रे जाग्रयामः पुरोहित को सिद्ध करने की कोशिश "माता भूमि पुत्रोहम पृथव्या के आधार पर ही संभव है। वास्तव में हिंदू राष्ट्र का अभिप्राय है,हिंसा और शोषण से मुक्त धरती। इस धरतीमाता के जितने पुत्र हैं, इनमें कुमति के कारण आपस में कलह,झगड़ा एवं अशांति, असुरक्षा, अमंगल का भयावह जो चित्र उपस्थित हुआ है* *इस चित्र को देखते हुए विश्वमंगल की भावना से कहा गया है कि* __ "*जहां सुमति तहां संपत्ति नाना, जहां कुमति तहां विपत्ति निदाना*।" *सुमति संपन्न श्री सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान की रहनी सहनी हमें निजधर्म पर चलना सिखाती है। अतः* "*मत की रति,गति, भूति भलाई* *जब जेहि जतन जहां जेहि पाई।* *सो जानहु सतसंग प्रभाऊ* *लोकहु वेदन आन उपाऊ।"* *प्रश्न:आम जनता के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?* *उत्तर: संपूर्ण मानव सभ्यता से गोपाल प्रसाद का विनम्र निवेदन है कि स्वाध्याय का आश्रय लेकर के विवेक संपन्नता के उपक्रम को प्राथमिकता दी जाए,जिससे स्वस्थ, प्रसन्न , यशस्वी सामाजिक जीवन संभव है।अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में रामजी के साथ निषादराज, केवट, शबरी, विभीषण और जामवंत, सुग्रीव आदि चरित्र प्रमाणित कर रहे हैं कि आत्मवत व्यवहार करनेवाले राम रघुनाथ को जो स्वीकार्यता मिली है, वह प्रेम के बल पर मिली है। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।* *"रामहि केवल प्रेम प्यारा, जान लियो जो जानन हारा।"* ______________________________________________ *जय सिया राम* *प्रस्तोता*: *मिथिलावासी* *गोपाल प्रसाद खटीक (आरटीआई सेवक)* *राष्ट्रीय सह संयोजक भारत गठबंधन* *मकान नंबर 12, गली नंबर -5* *निकट बालकनाथ मंदिर,आई पी एक्सटेंशन,* *नई दिल्ली- 110092* *मोबाईल नंबर: 9910341785,7678261884* *व्हाट्सएप नंबर: 8178949704* *ईमेल:gopalrti7@gmail.com* *sampoornkranti2025@gmail.com*

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