मोदी सरकार द्वारा मंत्रियों एवं नौकरशाहों के चल अचल संपत्ति की जानकारी नहीं देने का अर्थ मोदी सरकार में पारदर्शिता का अभाव:गोपाल प्रसाद
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) एवं कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) एवं 6(3), तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 76 के तहत निम्नलिखित जानकारी मांगी गई थी—
मांगी गई सूचनाएँ
1. वर्ष 2014 से 2025 की अवधि में भारत सरकार के वर्तमान एवं पूर्व मंत्रियों पर यदि कोई कर (टैक्स) अथवा अन्य देय राशि बकाया हो, तो उसकी वसूली हेतु की गई कार्रवाई, शिकायतवार, लंबित मामलावार, अद्यतन स्थितिवार, संबंधित नीति/नियमावली सहित अभिप्रमाणित प्रतिलिपि।
2. उपरोक्त अवधि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को प्राप्त भ्रष्टाचार/घोटालों की शिकायतों पर जांच हेतु की गई कार्रवाई, आयोग/विशेष जांच दल (SIT) का गठन, उनकी रिपोर्ट, अद्यतन स्थिति, अनुमानित नुकसान एवं वसूली की जानकारी की अभिप्रमाणित प्रतिलिपि।
3. उपरोक्त अवधि में केंद्र सरकार के मंत्रियों द्वारा घोषित चल-अचल संपत्ति, व्यवसाय एवं आय के स्रोत जिस विभागीय वेबसाइट पर और जिस वेबलिंक पर अपलोड किए गए हैं, उसकी अभिप्रमाणित प्रतिलिपि।
4. उपरोक्त अवधि में प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद यदि प्रशासनिक सेवाओं (IAS, IPS, IRS, IIS, IFS) के अधिकारियों द्वारा संपत्ति विवरण प्रस्तुत नहीं किए गए, तो उससे संबंधित शिकायतें एवं उन पर की गई कार्रवाई, विभागवार/पदनामवार/आदेशवार अभिप्रमाणित प्रतिलिपि।
5. उपरोक्त अवधि में प्रधानमंत्री को प्राप्त चुनावी अनियमितताओं से संबंधित शिकायतें (मंत्रियों व अधिकारियों पर) तथा उन पर की गई कार्रवाई, सर्विस बुक टिप्पणियाँ, आपत्तियाँ और अद्यतन स्थिति की अभिप्रमाणित प्रतिलिपि।
प्राप्त उत्तर:
1. प्रधानमंत्री कार्यालय का उत्तर:
प्रधानमंत्री कार्यालय के अवर सचिव एवं केंद्रीय जनसूचना अधिकारी प्रवेश कुमार ने कहा—
“मांगी गई सूचना विभिन्न लोक प्राधिकरणों से संबंधित है और आवेदक यह सूचना केवल संबंधित लोक प्राधिकरण से ही प्राप्त कर सकते हैं।
धारा 6(3) के अंतर्गत आवेदन स्थानांतरित करने के विषय में आवेदक को यह सलाह दी जाती है कि केंद्रीय सूचना आयोग के निर्णय (आवेदन संख्या CIC/AT/A/2008/01280, श्री केतन कांतिलाल मोदी बनाम केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड, दिनांक 22.09.2009) का संदर्भ लें, जिसमें कहा गया है: 'स्थानांतरण को आवेदक का अधिकार नहीं माना जा सकता। आवेदक को स्वयं उचित लोक प्राधिकरण, जो सूचना रखता है, के समक्ष धारा 6(1) के तहत आवेदन करना होगा।’
इसके अतिरिक्त केंद्रीय सूचना आयोग के एक अन्य निर्णय (श्री राजेंद्र सिंह बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, शिकायत संख्या CIC/WB/C/2007/00967, दिनांक 19.06.2009) में कहा गया है:"आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत आवेदक एक ही आवेदन में अनेक असंबद्ध विषयों की सूचनाएँ नहीं मांग सकता, जब तक कि उन्हें अलग-अलग माना जाए और शुल्क अदा किया जाए।"
साथ ही, माननीय उच्चतम न्यायालय (मामला: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड बनाम आदित्य बंदोपाध्याय, दिनांक 09.08.2011) में कहा गया:"आरटीआई के तहत अंधाधुंध एवं अव्यावहारिक मांगें प्रतिकूल सिद्ध होंगी और सार्वजनिक प्राधिकरण का अधिकांश समय अनुपयोगी कार्यों में व्यतीत होगा।अतः इस आवेदन पर और कोई प्रतिक्रिया आवश्यक नहीं है। आवेदक को सलाह दी जाती है कि वेबसाइट www.pmindia.gov.in देखें।”
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2. गृह मंत्रालय का उत्तर: गृह मंत्रालय के उप सचिव (पुलिस-I) एवं सीपीआईओ डी.के. घोष ने कहा—
“मांगी गई सूचना के संकलन से लोक प्राधिकारी के संसाधनों का अनुपातहीन विचलन होगा। अतः धारा 7(9) के अंतर्गत सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।”
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3. डीओपीटी का उत्तर: केंद्रीय जनसूचना अधिकारी एवं अवर सचिव अनुराग सक्सेना ने कहा: “यह आपके आरटीआई आवेदन का उत्तर नहीं है। आपका आवेदन संबंधित मंत्रालयों/प्राधिकरणों को अग्रसारित किया जा रहा है। आपको सीधे संबंधित प्राधिकरण से संपर्क करना चाहिए।”
अवर सचिव एवं सीपीआईओ रूपेश कुमार (एवीडी 1A अनुभाग) ने कहा: “इस अनुभाग में ऐसा कोई डाटा संधारित नहीं किया जाता। अतः मांगी गई सूचना ‘शून्य’ मानी जाए।”
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4. कैबिनेट सचिवालय का उत्तर: अवर सचिव एवं सीपीआईओ सत्य प्रकाश चौधरी ने कहा— “मंत्रियों की संपत्ति और देनदारियों की घोषणा ‘आचार संहिता’ के तहत होती है, जिसे गृह मंत्रालय प्रशासित करता है। यह जानकारी गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। अधिकारियों संबंधी सूचना हेतु आवेदन डीओपीटी को अग्रसारित किया गया है।”
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5. राज्यसभा सचिवालय का उत्तर: “मांगी गई सूचना राज्यसभा सचिवालय के संबंधित अनुभाग से संबंधित नहीं है।”
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6. लोकसभा सचिवालय का उत्तर: अवर सचिव सुमन शर्मा ने आवेदन को बिना उत्तर दिए भारत निर्वाचन आयोग को अग्रसारित कर दिया।
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7. भारत निर्वाचन आयोग का उत्तर: अवर सचिव एवं सीपीआईओ शिल्पी श्रीवास्तव ने कहा— “मांगी गई सूचना भारत निर्वाचन आयोग में उपलब्ध नहीं है, और न ही वह उस लोक प्राधिकरण से संबंधित है, जिससे सूचना प्राप्त की जा सकती है।”
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8. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का उत्तर: अवर सचिव एवं सीपीआईओ प्रेम प्रकाश मौर्य ने कहा— “इस मंत्रालय के भारतीय वन सेवा प्रभाग में ऐसी कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।”
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9. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का उत्तर: अवर सचिव अवनीत कौर ने कहा— “आवेदन के बिंदु 1 से 5 सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रशासन विभाग से संबंधित नहीं हैं।”
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10. उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का उत्तर: निदेशक एवं सीपीआईओ टी.आर. सतीश चंद्रन ने कहा— “मंत्रियों की चल/अचल संपत्ति का विवरण इस प्राधिकरण के पास नहीं है। अधिकारीगण अचल संपत्ति का विवरण डीओपीटी द्वारा निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत करते हैं। शिकायतें डीओपीटी/सीवीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार निपटाई जाती हैं।”
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11. केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड / जीएसटी आयुक्तालय, आयकर विभाग आदि
(कई कार्यालयों से समान उत्तर प्राप्त हुए जिनका सारांश इस प्रकार है) —मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं है या इसके लिए आवेदक को अलग-अलग आवेदन एवं शुल्क प्रस्तुत करना होगा।
आरटीआई अधिनियम धारा 24 के अंतर्गत कुछ विभाग (जैसे आयकर महानिदेशालय – अन्वेषण) गुप्तचर/सुरक्षा संगठन होने के कारण सूचना देने से मुक्त हैं।
सर्वोच्च न्यायालय एवं दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णयों में कहा गया है कि लोक प्राधिकरण नई सूचना संकलित/सृजित करने हेतु बाध्य नहीं हैं।
यदि सूचना उपलब्ध नहीं है, तो केवल वही उपलब्ध कराई जाएगी जो रिकॉर्ड में पहले से विद्यमान है।
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निष्कर्ष: इस प्रकार, मांगी गई सूचनाओं पर अधिकांश मंत्रालयों/प्राधिकरणों ने या तो सूचना न होने, संसाधनों के अनुपातहीन विचलन, या कानूनी छूट का हवाला देते हुए उत्तर देने से इंकार किया, अथवा आवेदन को अन्य प्राधिकरणों को अग्रसारित कर दिया। मोदी सरकार द्वारा मंत्रियों एवं नौकरशाहों के चल अचल संपत्ति की जानकारी नहीं देने का अर्थ मोदी सरकार में पारदर्शिता का अभाव है।
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✍️ प्रेषक:
गोपाल प्रसाद (आरटीआई सेवक)
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