ईवीएम विवाद–1991 से 2025 तक चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
ईवीएम विवाद–1991 से 2025 तक चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के उपयोग को लेकर गहरे सवाल उठ रहे हैं। प्रस्तुत तथ्य दर्शाते हैं कि 1991 से 2014 तक दोषपूर्ण ईवीएम का प्रयोग कराकर चुनाव कराए गए। इसके बाद 2010 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर VVPAT जोड़ी गई, किंतु 2018 के बाद से चुनाव आयोग ने मशीनों में “काले काँच” जैसी नई तकनीकी हेराफेरी कर दी, जिससे कागज़ी वोट भी चोरी होने का खतरा बना हुआ है।
मुख्य बिंदु:
1. 1991 से इंजीनियरों ने चेताया था कि फिज़िकल एक्सेस रखने वाले अधिकारी मशीन से वोट चुरा सकते हैं।
2. चुनाव आयोग (CEC) ने हमेशा कहा – “मशीन नहीं देंगे, बिना छुए हैक करके दिखाओ”, जबकि असली खतरा इनसाइडर टेंपरिंग का था।
3. 2010 में हैदराबाद के इंजीनियर हरिप्रसाद ने वास्तविक ईवीएम में वोट चोरी साबित कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मशीनें सुरक्षित नहीं हैं।
4. 2018 में पारदर्शी काँच हटाकर काला काँच लगाया गया। इंजीनियर राहुल मेहता ने इसका भी डेमो जंतर मंतर पर दिखाया, जिसे करोड़ों लोगों ने देखा।
5. इसके बावजूद चुनाव आयोग ने अपनी मशीनें स्वतंत्र जांच के लिए कभी उपलब्ध नहीं कराई और केवल “हैक करके दिखाओ” की रट लगाता रहा।
सवाल यह है कि:
क्या भारत का लोकतंत्र ऐसे दोषपूर्ण और अपारदर्शी चुनावी सिस्टम पर आधारित रह सकता है? क्या चुनाव आयोग जनता को यह भरोसा दिला सकता है कि उसकी मशीनें छेड़छाड़ से सुरक्षित हैं, जब तक वे स्वतंत्र जांच के लिए उपलब्ध ही नहीं कराई जाती?
जारीकर्ता:
गोपाल प्रसाद खटीक (आरटीआई सेवक)
राष्ट्रीय सह संयोजक, भारत गठबंधन
मकान नंबर-12, गली नंबर-5,
निकट बालकनाथ मंदिर, चंदर विहार,
आई.पी. एक्सटेंशन, दिल्ली-110092
मोबाइल: 9910341785, 7678261884
Email: gopalrti7@gmail.com
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